ऋत्विक घटक: जब आदिवासियों की कहानियों ने बदला सिनेमा का चेहरा, 100वीं जयंती से पहले जानो उनका सफर!

भारतीय सिनेमा में कुछ नाम ऐसे हैं जो बस इतिहास में नहीं, बल्कि हमारी फिल्मों की रूह में बसते हैं. उन्हीं में से एक हैं ऋत्विक कुमार घटक, जो बांग्ला सिनेमा की ‘त्रयी’ (Satyajit Ray और Mrinal Sen के साथ) में गिने जाते हैं. सोचो, जब 1955 में Satyajit Ray की पहली फिल्म 'पाथेर पांचाली' पर्दे पर धमाल मचा रही थी, तब हमारे ऋत्विक घटक कहाँ थे? वो तब के बिहार (आज के झारखंड) के एकदम दूर-दराज़ इलाकों में आदिवासियों के बीच काम कर रहे थे. कोलकाता से उनका वहाँ जाना कोई इत्तेफ़ाक नहीं था, बल्कि एक गज़ब की कहानी थी!
बिहार से जुड़ाव और डॉक्युमेंट्रीज़ का सिलसिला
दरअसल, बिहार सरकार का जनसंपर्क विभाग एक धांसू प्लान पर काम कर रहा था. वे अपने दक्षिणी इलाके 'छोटानागपुर' के आदिवासियों की ज़िंदगी, उनकी अनोखी संस्कृति और रंगीन मेलों को पूरी दुनिया को दिखाना चाहते थे. इस समृद्ध विरासत को कैमरे में कैद करने के लिए सरकार ने सोचा – क्यों न डॉक्युमेंट्रीज़ बनाई जाएँ? उस टाइम राधाकृष्ण नाम के शख्स बिहार सरकार की 'आदिवासी' मैगज़ीन के एडिटर थे. उन्हें सिनेमा की गज़ब की समझ थी, क्योंकि वो मुंबई और कोलकाता में फिल्म राइटिंग से जुड़े रहे थे. बस, सरकार ने इस प्रोजेक्ट के लिए उन्हें चुन लिया.
राधाकृष्ण के संपर्क में आए ऋत्विक घटक उस वक़्त के एकदम युवा, टैलेंटेड और अपने काम के प्रति सुपर डेडिकेटेड थे. बिहार सरकार ने इसके लिए कोलकाता के अरोरा स्टूडियो से भी हाथ मिला लिया. और फिर क्या था, राधाकृष्ण के लिखे कॉन्सेप्ट्स पर ऋत्विक घटक ने तीन कमाल की डॉक्युमेंट्रीज़ बनाईं: 'आदिवासियों का जीवन स्रोत', 'उरांव' और 'बिहार के पर्यटन स्थल'. अफ़सोस की बात ये है कि इनमें से आज सिर्फ़ 'आदिवासियों का जीवन स्रोत' ही उपलब्ध है, जिसे देखकर हम आज भी उनके विज़न को समझ सकते हैं. काश, बाकी फिल्में भी मिल पातीं!
आदिवासियों के जीवन को समझा, कैमरे से भी गहरा
जब ऋत्विक घटक पहली बार आदिवासी जन-जीवन से मिले, तब उनकी उम्र सिर्फ़ 30 साल थी. इतनी कम उम्र में उन्होंने आदिवासियों के इतिहास, उनकी संस्कृति, कला को देखने का उनका अपना नज़रिया, उनकी सादी ज़िंदगी और सबसे खास बात — अभावों के बीच भी ख़ुशी से जीने की उनकी गज़ब की आदत को बहुत करीब से देखा और महसूस किया. उनके इस गहरे नज़रिया को हम उनके लेख 'अबाउट उरांव' में भी पढ़ सकते हैं. मतलब, वो सिर्फ डॉक्यूमेंट्री नहीं बना रहे थे, बल्कि उनकी ज़िंदगी को जी रहे थे.
15 मिनट की डॉक्युमेंट्री 'आदिवासियों का जीवन स्रोत' में आदिवासियों की पूरी दुनिया को समेटा गया है: उनके मेले, शादियाँ, धांसू डांस, शिकार के उत्सव, करमा पूजा, उनकी 'पड़हा व्यवस्था', उनके घर-मकान और झरने – सब कुछ. इसमें जो नगाड़ा बजता है, बांसुरी की वो मीठी धुन और मांदर-ढोल का संगीत, वो इस डॉक्युमेंट्री में जान डाल देते हैं. ऋत्विक घटक का मानना था कि डॉक्युमेंट्री बनाने के लिए लोगों से गहरा प्यार होना बहुत ज़रूरी है, क्योंकि ये सिर्फ फिल्में नहीं, बल्कि इंसानी ज़िंदगी के सच्चे दस्तावेज़ होते हैं. अब बताओ, इतना गहरा कौन सोचता है?
विस्थापन का दर्द और ‘अजांत्रिक’ का जादू
भले ही ऋत्विक घटक ने अपनी रोज़ी-रोटी के लिए ये डॉक्युमेंट्रीज़ बनाई हों, लेकिन छोटानागपुर से उनका ये खास रिश्ता उनकी बाद की फिल्मों में भी साफ-साफ झलकता था. 1957 में उन्होंने 'उरांव' नाम की एक डॉक्युमेंट्री डायरेक्ट की, जिसे उनकी आइकॉनिक फिल्म 'अजांत्रिक' की शुरुआत माना जाता है. इसकी शूटिंग 1955 में छोटानागपुर में ही हुई थी और इसके कुछ सीन्स तो 'अजांत्रिक' में भी यूज़ किए गए थे. रांची में शूटिंग के दौरान उनका उरांव और मुंडा समुदायों से बहुत पक्का रिश्ता बन गया था. इन समुदायों के बार-बार विस्थापित होने की कहानी ने ऋत्विक को अंदर से हिला दिया था. वो विस्थापन के साथ-साथ विभाजन के दर्द को भी महसूस कर रहे थे, और ये थीम उनकी कई फिल्मों में बार-बार लौटकर आती रही.
22 फरवरी, 1955 को ऋत्विक घटक ने रांची से अपनी होने वाली पत्नी Surma को एक बड़ा ही इमोशनल ख़त लिखा था, जो उनके इस जुड़ाव को दिखाता है. उन्होंने लिखा था, "पिछले कुछ दिनों से मैं रांची में पूरे उत्साह के साथ काम कर रहा हूं। पर क्या खुशी है, कैसे बताऊं? पूरा दिन उनके बीच बिता रहा हूं, उनकी मिट्टी का स्वाद ले रहा हूं, उनके गीतों की मधुर धुनें और उनके नृत्यों की मादक लय, उत्पीड़ित जीवन में जीने की उनकी तड़प। मैं इस हकीकत का बस एक टुकड़ा ही अपने साथ ले जा सकता हूं, लेकिन इससे मुझे पक्का यकीन हो गया है कि मैं लोगों को समझा सकता हूं। मैं फिर से वापस आना चाहता हूं, और भी बड़ी, ज्यादा यथार्थवादी और व्यापक फिल्में बनाने के लिए।"
बाद में, जब ऋत्विक घटक ने अपनी पहली कमर्शियल बांग्ला फिल्म 'अजांत्रिक' (1958) बनाई, तो वो फिर से शूटिंग के लिए रांची और आस-पास के इलाकों में लौट आए. इस फिल्म की सबसे खास बात ये थी कि इंडियन बड़े पर्दे पर पहली बार आदिवासी समाज को इतने रियलस्टिक तरीके से दिखाया गया था. इससे मेनस्ट्रीम दर्शक उस समय के आदिवासी जीवन और उनकी सामूहिक व्यवस्था को समझ पाए. सच में, ऋत्विक घटक सिर्फ एक फिल्ममेकर नहीं थे, बल्कि समाज के एक आइने जैसे थे. उनकी 100वीं जयंती पर क्या हम ऐसे और कलाकारों को याद करेंगे, जिन्होंने लोगों की कहानियों को पर्दे पर उतारा?
