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ना VFX, ना करोड़ों का खर्चा! 39 साल पहले रामानंद सागर ने कैसे बनाई थी 'रामायण'?

39 साल पहले रामानंद सागर ने 'रामायण' बनाकर देश को एक ऐसा तोहफा दिया था, जो आज भी लोगों के दिलों में बसा हुआ है. रामानंद सागर के इस विजन और प्रेजेंटेशन की बराबरी उस शो से पहले और बाद में बनी कई 'रामायण' भी नहीं कर पाईं. कमाल की बात तो ये है कि डायरेक्टर ने ये मेगा-हिट शो बनाने में न तो करोड़ों का बजट पानी की तरह बहाया और न ही फिजूलखर्ची की. उस वक्त महंगे कैमरे, हाईटेक VFX और कंप्यूटर ग्राफिक्स जैसी कोई तकनीक भी नहीं थी, जिसके दम पर सीन को भव्य बनाया जा सके. फिर भी, रामानंद सागर और उनकी टीम ने 'देसी जुगाड़' और कमाल की क्रिएटिविटी से मुश्किल से मुश्किल सीन्स को पर्दे पर सच कर दिखाया. शो के स्पेशल इफेक्ट्स की कहानी सच में मैजिकल थी!

जुगाड़ से बने जादुई इफेक्ट्स

रामानंद सागर के बेटे प्रेम सागर के मुताबिक, उस दौर में स्पेशल इफेक्ट्स के लिए कंप्यूटर का इस्तेमाल होता ही नहीं था. सारा काम कैमरे की ट्रिक्स और कुछ खास तकनीकों से किया जाता था. जैसे, बादलों का इफेक्ट देने के लिए कैमरा या कांच के आगे रूई लगाई जाती थी — सोचो, रूई से बादल! वहीं, कोहरा या धुंध दिखाना होता था, तो सेट पर अगरबत्ती और धूप का इस्तेमाल किया जाता था.

सीन में बड़े-बड़े पहाड़ दिखाने के लिए भी कोई पहाड़ नहीं तोड़े गए थे, बल्कि 10 से 15 फीट तक के छोटे मिनिएचर मॉडल तैयार किए जाते थे. फिर कैमरा ट्रिक की मदद से इन्हें असली पहाड़ों जैसा दिखाया जाता था. मतलब, कम बजट में भी ग्रैंड विजुअल्स का पूरा जुगाड़ था!

शिव तांडव जैसे जटिल सीन भी मेकर्स ने बड़े ही क्रिएटिव तरीके से तैयार किए थे. इसके लिए स्लाइड प्रोजेक्टर का यूज किया गया था. बैकग्राउंड में छोटे ग्रहों के मॉडल रखे जाते थे और स्लाइड्स के जरिए पूरा दृश्य बनाया जाता था. सोचिए, कैसे उस दौर में बिना किसी महंगे सॉफ्टवेयर के ये सब संभव हो पाया होगा.

देवी-देवताओं और रावण के पुष्पक विमान वाले सीन में एक्टर्स को हवा में उड़ता हुआ दिखाने के लिए कैमरे की ट्रिक और तारों की मदद ली गई. इन तारों से एक्टर्स को हवा में उड़ाकर बैकग्राउंड प्लेट से जोड़ा जाता था, कई सीन्स के लिए प्लास्टर-ऑफ-पेरिस (POP), बांस, घास-फूस और लकड़ी के बने प्रॉप्स भी खूब इस्तेमाल हुए थे. ये सब दिखाता है कि तब के मेकर्स कितने टैलेंटेड थे कि कम रिसोर्सेज में भी बेस्ट आउटपुट दे पाते थे.

युद्ध और कुंभकरण वध: हर सीन में थी बारीकी

'रामायण' के वॉर सीन्स बनाने में भी मेकर्स की खूब मेहनत लगी थी. तीरों की टक्कर से निकलने वाली चिंगारी और दिव्य अस्त्रों के इफेक्ट्स दिखाने के लिए SEG 2000 नाम की एक नई मशीन का यूज किया गया था, जो उस वक्त मार्केट में नई-नई आई थी. मैकेनिकल इफेक्ट्स और ग्लास मैटिंग जैसी तकनीकों का सहारा लेकर भी कई मुश्किल दृश्य तैयार किए गए. उस दौर में आधुनिक CGI और कंप्यूटर VFX नहीं थे, लेकिन इन कैमरा ट्रिक्स, ऑप्टिकल और मैकेनिकल इफेक्ट्स के जरिए ही कई मुश्किल दृश्यों को पर्दे पर उतारा गया. युद्ध के दृश्यों में भव्यता लाने के लिए करीब 2,000 जूनियर कलाकारों को सेट पर बुलाया जाता था. इतनी बड़ी कास्ट और इतने मैन्युअल इफेक्ट्स, वाकई ये एक मेगा प्रोजेक्ट था!

रामायण में कुंभकरण का वध दिखाना काफी मुश्किल काम था, लेकिन रिपोर्ट्स के मुताबिक, मेकर्स ने इसके लिए कुंभकरण के चेहरे का खास मोल्ड तैयार किया था. कटे हुए हाथ और शरीर के बाकी हिस्सों को दिखाने के लिए प्लास्टर ऑफ पेरिस से नकली अंग बनाए गए थे.

उमरगाम से रात के 3 बजे तक शूटिंग का डेडिकेशन

इस ऐतिहासिक शो की शूटिंग के लिए रामानंद सागर ने गुजरात के उमरगाम को चुना था. यहीं पर अयोध्या, लंका, मिथिला और किष्किंधा के सेट तैयार किए गए थे. एक ही जगह पर अलग-अलग राज्यों और राजमहलों के सेट बनाकर शूटिंग की जाती थी. प्रेम सागर ने बताया कि शूटिंग के लिए कोई फिक्स कॉलशीट या तय शेड्यूल नहीं होता था. ये बात सुनकर तो हमारी आंखें फटी रह गईं! अगर रामानंद सागर रात तीन बजे भी कोई सीन लिखकर पूरा करते थे, तो शूटिंग उसी वक्त शुरू कर दी जाती थी. मतलब, एकदम 'नो टाइम टू वेस्ट' वाली फीलिंग थी, डेडिकेशन ऐसा कि आज के एक्टर्स भी सोच में पड़ जाएं!

'महंगा' था, पर आज के आगे कुछ नहीं!

'हिंदुस्तान टाइम्स' की रिपोर्ट के मुताबिक, 'रामायण' के हर एपिसोड का बजट करीब नौ लाख रुपये था. उस समय के हिसाब से ये एक महंगा टीवी शो था, लेकिन आज के करोड़ों के बजट वाले शोज के सामने तो ये एक टी-पार्टी का बिल लगता है, है ना?

बिना किसी हाई-फाई तकनीक के, सिर्फ क्रिएटिविटी, डेडिकेशन और 'देसी जुगाड़' के दम पर रामानंद सागर ने एक ऐसा एपिक क्रिएट किया, जो आज भी लोगों को बांधे रखता है. ये बात साफ बताती है कि कहानी कहने का जादू और विजन पैसों या VFX का मोहताज नहीं होता, बल्कि दिमाग और मेहनत का खेल होता है. क्या आज के मेकर्स भी ऐसे एक्सपेरिमेंट करने की हिम्मत दिखा पाएंगे? हमें तो लगता है, बस 'देसी दिल' चाहिए!

सार्वजनिक स्रोतों, विकिपीडिया, यूट्यूब, इंस्टाग्राम और टिकटॉक से जानकारी के साथ।